क्या “PK” फिल्म तर्कहीन और नस्लवादी (Racist) थी?
मैं काफी समय से ये कहने की सोच रहा था, और अब लग रहा है कि कहना चाहिए। PK पर काफी बातें हो रही हैं—कुछ लोग पसंद करते हैं, कुछ नहीं। एक पुरवांचल के बंदे (हाँ, वही जहां भोजपुरी बोली जाती है) और टेक्निकल बैकग्राउंड से होने के नाते, मैंने सोचा कि अपनी राय भी रख ही दूं। तो लीजिए, मेरी समीक्षा!
पीके: एक अनोखी कहानी या लॉजिक से परे कल्पना?
आमिर खान की फिल्में हमेशा कुछ न कुछ नया लेकर आती हैं। ‘पीके’ (2014) भी एक अनोखी कोशिश थी, जिसमें सामाजिक मुद्दों पर कटाक्ष किया गया था। लेकिन क्या यह फिल्म वाकई उतनी शानदार थी, जितनी इसे बताया गया? या फिर इसमें भी कुछ गंभीर कमियां थीं?
कहानी – एक एलियन जो सवाल पूछता है
फिल्म की शुरुआत एक एलियन (आमिर खान) के धरती पर उतरने से होती है। उसके पास एक डिवाइस होती है, जिससे वह अपने ग्रह पर वापस जा सकता है, लेकिन वह चोरी हो जाती है। इस डिवाइस को पाने के लिए वह भटकता है और इस दौरान उसे अहसास होता है कि धरती पर "भगवान" से प्रार्थना करने से चीजें मिलती हैं। इसके बाद वह अलग-अलग धर्मों की मान्यताओं और परंपराओं को समझने की कोशिश करता है।
इस सफर में उसकी मुलाकात होती है पत्रकार जगत जननी (अनुष्का शर्मा) से, जो उसकी कहानी को जनता के सामने लाने में मदद करती है। अंततः फिल्म धार्मिक पाखंड को उजागर करते हुए यह संदेश देती है कि ईश्वर को डर के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास से पाया जाता है।
फिल्म की सबसे बड़ी कमियां और प्लॉट होल्स
1. क्या एक एडवांस एलियन इतना भोला हो सकता है?
फिल्म में आमिर खान एक उन्नत सभ्यता के एलियन का किरदार निभाते हैं, जो इंटरगैलेक्टिक ट्रैवल कर सकता है। लेकिन जैसे ही वह धरती पर आता है, वह एक नासमझ देहाती की तरह बिहेव करता है।
सोचिए, हमारी धरती अभी तक अपने सौर मंडल से बाहर जाने में असमर्थ है, लेकिन यह एलियन इतनी दूर से आया है। फिर भी वह भगवान की पूजा जैसी सरल चीज़ नहीं समझ सकता?
अगर कोई एलियन वाकई में इतना एडवांस होता, तो या तो वह हमें गाइड करता या हम पर राज करता। लेकिन पीके का किरदार सिर्फ एक भोला-भाला देहाती बनकर रह गया।
आप सोचकर देखिए, पीके ने जो सवाल पूछे थे अगर इन सवालों को असरदार बनाना है, तो इन्हें भोजपुरी में ही पूछा जाना चाहिए। हिंदी या अंग्रेज़ी में पूछने पर वही प्रभाव नहीं आएगा। बतौर दर्शक, हम भी यही उम्मीद रखते हैं कि भोजपुरी बोलने वाले लोग वैसे ही व्यवहार करें। इसी वजह से हमें यह अजीब नहीं लगा और हम हँस पड़े। यही मज़ा तब भी आ सकता है जब कोई पूर्वांचल का आदमी अपनी याददाश्त खो बैठे और अब 50 साल के शरीर में 8 साल के बच्चे जैसा व्यवहार करने लगे!
2. भोजपुरी लहजे की चालाकी!
अब सोचिए, अगर पीके अंग्रेज़ी बोलता और कहता—
"God does not exist!"
तो क्या हमें वह मासूम लगता? शायद नहीं।
लेकिन जैसे ही पीके भोजपुरी में कहता—
"का ई भगवान सच में हैं का?"
तुरंत लोग उसे भोला, सीधा-सादा और मासूम समझने लगते हैं।
यानी, फिल्म ने भाषा के ज़रिए नस्लीय पूर्वाग्रह का फायदा उठाया। भोजपुरी = गंवार और मासूम का फार्मूला सेट कर दिया गया।
3. धर्म पर ज्ञान देने के बजाय एक बढ़िया साइंस-फिक्शन क्यों नहीं बना सके?
जब पूरी दुनिया The Matrix, Interstellar, The Three-Body Problem जैसी शानदार Sci-Fi बना रही थी, भारत ने क्या दिया?
"धार्मिक बहस वाला एलियन!"
अगर पीके वाकई एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चीज़ें देखता, तो यह भारत की पहली शानदार साइंस-फिक्शन फिल्म बन सकती थी। लेकिन...
- हमें धर्म के पीछे भागने वाला एलियन मिला।
- हमें भोजपुरी बोलने वाला 'भोला' एलियन मिला।
- और हमें एक गंभीर Sci-Fi के बदले धार्मिक ड्रामा मिल गया।
4. भगवान और धर्मगुरुओं की आलोचना – लेकिन सॉल्यूशन क्या है?
फिल्म में बताया गया कि धर्मगुरु लोगों को डराकर उनका फायदा उठाते हैं, जो कि कई बार सच भी होता है। लेकिन फिल्म यह स्पष्ट नहीं करती कि सही समाधान क्या है।
- क्या धर्म से पूरी तरह दूर हो जाना चाहिए?
- क्या ईश्वर को मानना गलत है या सिर्फ अंधभक्ति से बचना जरूरी है?
- फिल्म यह नहीं बताती कि जो लोग सच में धार्मिक हैं लेकिन कट्टरता से दूर हैं, उनका क्या स्थान है?
5. पीके की सफलता और भारतीय दर्शकों की पसंद
फिर भी, फिल्म सफल रही। क्यों?
क्योंकि भारत में तीस करोड़ अर्ध-शिक्षित छद्म बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें धर्म पर बहस पसंद है। लेकिन इन्हीं के बीच छह करोड़ ऐसे उच्च-शिक्षित लोग भी हैं, जो सच में तर्कशील हैं।
पीके की सफलता की असली वजह यह थी कि इसे 30 करोड़ छद्म-बुद्धिजीवियों ने भी देखा, जो कुछ भी ट्रेंडिंग हो उसे सही मान लेते हैं।
6. पीके के प्रयोग: स्थानीय जनता पर एक्सपेरिमेंट!
अगर पीके यह साबित करने में जुट जाता कि भगवान नहीं होते, तो क्या करता? सीधा एक्सपेरिमेंट! अब ये प्रयोग हास्यप्रद भी होते और लोगों की भावनाओं को भी उकसाते।
और इस तरह पीके का धर्म विरोध सिर्फ तार्किक नहीं, बल्कि एक्शन-पैक्ड ड्रामा भी बन जाता।
दिलचस्प बात यह है कि पीके पहली भारतीय फिल्म थी जिसने 300 करोड़ का आंकड़ा पार किया।
फिल्म की कुछ अच्छी बातें
हालांकि फिल्म में कुछ लॉजिकल कमियां थीं, लेकिन यह कहना गलत होगा कि इसमें कोई दम नहीं था।
- आमिर खान का अभिनय – पीके का भोला-भाला और मासूम किरदार निभाने में आमिर शानदार रहे।
- संदेश – फिल्म ने यह बताने की कोशिश की कि अंधविश्वास और धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड से बचना चाहिए।
- कॉमेडी और इमोशन का बैलेंस – फिल्म के कुछ दृश्य बहुत मजेदार और दिल छू लेने वाले थे।
क्या ‘पीके’ देखने लायक थी?
अगर आप एक मनोरंजक फिल्म देखना चाहते हैं, जो आपको हंसाए और सोचने पर मजबूर करे, तो ‘पीके’ अच्छी फिल्म थी। लेकिन अगर आप लॉजिक और गहराई से हर चीज का विश्लेषण करते हैं, तो यह फिल्म आपको कई बार निराश कर सकती है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐ (3/5) – अच्छी फिल्म, लेकिन लॉजिक मत ढूंढिए!
‘पीके’ एक बेहतरीन Sci-Fi फिल्म हो सकती थी, लेकिन…
अगर यह फिल्म सच में वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण अपनाती, तो यह सिर्फ एक धार्मिक बहस नहीं बल्कि भारत की सबसे बेहतरीन Sci-Fi फिल्मों में से एक होती।
लेकिन अब उम्मीद यही है कि आने वाले समय में भारत में भी असली साइंस-फिक्शन फिल्में बनें!
अगर इस फिल्म में वास्तव में एक उन्नत एलियन सभ्यता की असली झलक दिखाई जाती, अगर पीके को वाकई एक उच्च बुद्धिमान प्राणी के रूप में दिखाया जाता, अगर फिल्म धार्मिक बहस से हटकर साइंस और लॉजिक पर ध्यान देती, तो यह भारत की पहली बेहतरीन साइंस-फिक्शन फिल्म बन सकती थी। लेकिन हुआ क्या?
- हमें एक नासमझ एलियन दिया गया जो धर्म पर ज्ञान बांटता है।
- हमें भोजपुरी बोलकर मासूम बनने वाला आमिर खान मिला।
- और हमें एक अच्छी साइंस-फिक्शन फिल्म की जगह फिर से एक “ज्ञान देने वाली” बॉलीवुड फिल्म दी गई।
यही कारण है कि भारतीय दर्शकों को असली साइंस-फिक्शन देखने के लिए हमेशा हॉलीवुड या कोरियन और जापानी इंडस्ट्री पर निर्भर रहना पड़ता है।
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